राम जन्मभूमि आंदोलन के समय से जो पार्टी का हार्डकोर धड़ा है, वो सवाल
करेगा कि अगर अब आपने हिंदुत्व विचारधारा को स्थापित नहीं किया संस्थाओं
में तो कब करेंगे? इससे बड़ी जीत क्या हो सकती है?
ये दबाव आएगा तो मुझे नहीं लगता कि मोदी इसे रोकेंगे या पीछे हटेंगे. इसी चुनाव में देखा गया है कि मानक बिल्कुल गिरते जा रहे हैं. दस साल पहले क्या कोई कल्पना करता था कि प्रज्ञा ठाकुर बीजेपी की स्टार उम्मीदवार होंगी. उनकी जीत पर आज जश्न मनाया जा रहा है. ये एक तरह का ज़हर है जिसे आप दोबारा बोतल में नहीं डाल सकते हैं.
बहुसंख्यकवाद के ख़तरे इस चुनाव में बड़ी स्पष्ट रूप से उभरकर आए हैं.
ये चुनाव उन परिस्थितियों में हुआ जहां भारत की आर्थिक व्यवस्था उतनी सुदृढ़ नहीं है जितना प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं. वास्तविक ग्रोथ रेट चार या साढ़े चार प्रतिशत है. बेरोज़गारी की समस्या है.
कृषि क्षेत्र में संकट है. इस सबके बाद भी अगर जनता ने इन्हें वोट दिया है तो यही निष्कर्ष निकलता है कि वो मज़बूत नेता चाहते थे. दूसरा आज हम उस स्थिति में पहुंच गए हैं जहां बहुसंख्यकवाद का बहुसंख्यकों पर ज़्यादा असर नहीं पड़ता है. वो समझते हैं कि हमें कोई क्या कर लेगा. ये भारतीय लोकतंत्र का बड़ा नाजुक मोड़ है.
जनता ने अपना फ़ैसला दे दिया है तो कहा जा सकता है कि ये लोकतंत्र की जीत है. लेकिन ये उदारता की जीत नहीं है. ये संवैधानिक मूल्यों की जीत नहीं है.
(होना ये चाहिए कि) हम ऐसा भारत बनाएं जहां हर व्यक्ति चाहे वो किसी भी जाति या समुदाय का हो, उसे ये ख़तरा नहीं रहे कि मैं जिस समुदाय से आता हूं, उसकी वजह से मुझे कोई ख़तरा है.
भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी से एक सबक़ लिया जाना चाहिए कि वो लंबे वक़्त के लिए धैर्य के साथ रणनीति बनाते हैं. वो राम जन्मभूमि आंदोलन के समय से लंबा खेल खेल रही है.
अगर चुनाव में हार होती है तो सांस्कृतिक संस्थाओं पर ध्यान देते हैं. राजनीति में पीछे छूट जाते हैं तो सामाजिक काम करते हैं. उनकी रणनीति का ठोस आधार ये है कि एक ही बात को बार-बार बोलते जाइए ताकि कोई ये न कहे कि आप अपने लक्ष्य से हट गए हैं. रणनीति चुनाव के बीच में शुरू नहीं की जा सकती.
कांग्रेस की ओर से देखें तो उनकी चुनाव मशीन पिछले साल या डेढ़ साल में सक्रिय हुई है. कांग्रेस के पास पैसे की कमी थी. हालांकि, कांग्रेस वाले ख़ुद ही मज़ाक करते थे कि कांग्रेसी अमीर हैं, कांग्रेस पार्टी ग़रीब है.
वहीं भारतीय जनता पार्टी का हर नेता और कार्यकर्ता चौबीस घंटे पार्टी के लिए काम करता है. रणनीति में आपको संगठन और विचारधारा चाहिए. 2014 में जब बीजेपी की जीत हुई थी, उसके दो साल पहले से माहौल बनाया जा रहा था कि हमारे सिस्टम में ये खामियां हैं. इसका फ़ायदा बीजेपी ने उठाया.
वक्ताओं की बात करें तो कांग्रेस में ऐेसे दो या तीन नेता खोजने मुश्किल हैं जो हिंदी में अच्छे वक़्ता हों.
मज़बूत सरकार के रहते संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती की बात करें तो सेना जैसी संस्थाएं जो पूजनीय मानी जाती थीं जिस पर कोई राजनीतिक आक्षेप कभी नहीं लगता था. पिछले छह से आठ महीने में उसका राजनीतिक उपयोग और दुरुपयोग हुआ है.
आर्थिक तौर पर भी नाजुक दौर है. केवल मज़बूत सरकार स्थिति दुरुस्त रखने की गारंटी नहीं देती. लेकिन नरेंद्र मोदी के पास मौक़ा है कि वो इस जनादेश का इस तरह इस्तेमाल करें कि भारत के संवैधानिक मूल्य सुरक्षित रहें और आर्थिक व्यवस्था ठीक रहे. लेकिन जिस तरह का चुनाव अभियान था और जिस तरह के तत्व अब राजनीति में हैं, लगता है कि वो उन्हें ऐसा करने नहीं देंगे.
ये दबाव आएगा तो मुझे नहीं लगता कि मोदी इसे रोकेंगे या पीछे हटेंगे. इसी चुनाव में देखा गया है कि मानक बिल्कुल गिरते जा रहे हैं. दस साल पहले क्या कोई कल्पना करता था कि प्रज्ञा ठाकुर बीजेपी की स्टार उम्मीदवार होंगी. उनकी जीत पर आज जश्न मनाया जा रहा है. ये एक तरह का ज़हर है जिसे आप दोबारा बोतल में नहीं डाल सकते हैं.
बहुसंख्यकवाद के ख़तरे इस चुनाव में बड़ी स्पष्ट रूप से उभरकर आए हैं.
ये चुनाव उन परिस्थितियों में हुआ जहां भारत की आर्थिक व्यवस्था उतनी सुदृढ़ नहीं है जितना प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं. वास्तविक ग्रोथ रेट चार या साढ़े चार प्रतिशत है. बेरोज़गारी की समस्या है.
कृषि क्षेत्र में संकट है. इस सबके बाद भी अगर जनता ने इन्हें वोट दिया है तो यही निष्कर्ष निकलता है कि वो मज़बूत नेता चाहते थे. दूसरा आज हम उस स्थिति में पहुंच गए हैं जहां बहुसंख्यकवाद का बहुसंख्यकों पर ज़्यादा असर नहीं पड़ता है. वो समझते हैं कि हमें कोई क्या कर लेगा. ये भारतीय लोकतंत्र का बड़ा नाजुक मोड़ है.
जनता ने अपना फ़ैसला दे दिया है तो कहा जा सकता है कि ये लोकतंत्र की जीत है. लेकिन ये उदारता की जीत नहीं है. ये संवैधानिक मूल्यों की जीत नहीं है.
(होना ये चाहिए कि) हम ऐसा भारत बनाएं जहां हर व्यक्ति चाहे वो किसी भी जाति या समुदाय का हो, उसे ये ख़तरा नहीं रहे कि मैं जिस समुदाय से आता हूं, उसकी वजह से मुझे कोई ख़तरा है.
भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी से एक सबक़ लिया जाना चाहिए कि वो लंबे वक़्त के लिए धैर्य के साथ रणनीति बनाते हैं. वो राम जन्मभूमि आंदोलन के समय से लंबा खेल खेल रही है.
अगर चुनाव में हार होती है तो सांस्कृतिक संस्थाओं पर ध्यान देते हैं. राजनीति में पीछे छूट जाते हैं तो सामाजिक काम करते हैं. उनकी रणनीति का ठोस आधार ये है कि एक ही बात को बार-बार बोलते जाइए ताकि कोई ये न कहे कि आप अपने लक्ष्य से हट गए हैं. रणनीति चुनाव के बीच में शुरू नहीं की जा सकती.
कांग्रेस की ओर से देखें तो उनकी चुनाव मशीन पिछले साल या डेढ़ साल में सक्रिय हुई है. कांग्रेस के पास पैसे की कमी थी. हालांकि, कांग्रेस वाले ख़ुद ही मज़ाक करते थे कि कांग्रेसी अमीर हैं, कांग्रेस पार्टी ग़रीब है.
वहीं भारतीय जनता पार्टी का हर नेता और कार्यकर्ता चौबीस घंटे पार्टी के लिए काम करता है. रणनीति में आपको संगठन और विचारधारा चाहिए. 2014 में जब बीजेपी की जीत हुई थी, उसके दो साल पहले से माहौल बनाया जा रहा था कि हमारे सिस्टम में ये खामियां हैं. इसका फ़ायदा बीजेपी ने उठाया.
वक्ताओं की बात करें तो कांग्रेस में ऐेसे दो या तीन नेता खोजने मुश्किल हैं जो हिंदी में अच्छे वक़्ता हों.
मज़बूत सरकार के रहते संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती की बात करें तो सेना जैसी संस्थाएं जो पूजनीय मानी जाती थीं जिस पर कोई राजनीतिक आक्षेप कभी नहीं लगता था. पिछले छह से आठ महीने में उसका राजनीतिक उपयोग और दुरुपयोग हुआ है.
आर्थिक तौर पर भी नाजुक दौर है. केवल मज़बूत सरकार स्थिति दुरुस्त रखने की गारंटी नहीं देती. लेकिन नरेंद्र मोदी के पास मौक़ा है कि वो इस जनादेश का इस तरह इस्तेमाल करें कि भारत के संवैधानिक मूल्य सुरक्षित रहें और आर्थिक व्यवस्था ठीक रहे. लेकिन जिस तरह का चुनाव अभियान था और जिस तरह के तत्व अब राजनीति में हैं, लगता है कि वो उन्हें ऐसा करने नहीं देंगे.
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